अमरावती सृजन पुरस्कार-2026 समारोह के अवसर पर हिन्दी के सुपरिचित लेखक जय प्रकाश मानस का वक्तव्य
कविता लिखने से पहले शायद मैं कविता को नहीं जानता था। अब भी यह दावा नहीं कर सकता कि जानता हूँ। कविता मेरे पास किसी बड़ी घोषणा की तरह नहीं आयी। वह धीरे-धीरे आयी -जैसे घर के किसी पुराने कोने में धूप उतरती है और हमें पता भी नहीं चलता कि अंधेरे का कितना हिस्सा कम हो गया है। जैसे बारिश के बाद मिट्टी से कोई गंध उठती है और अचानक बचपन सामने खड़ा मिल जाता है। जैसे जंगल से लौटती कोई बूढ़ी स्त्री अपनी टोकरी में कुछ ऐसी चीजें ले आती है, जिनका नाम वह स्वयं भी नहीं जानती, लेकिन शाम होते-होते उन्हीं से बच्चों के लिए कोई कहानी बुन देती है। शायद मेरे लिए कविता भी ऐसी ही कोई चीज है। मैंने शब्दों को तराशकर चमकाने से अधिक उनके पास बैठना चाहा है। उनके भीतर छिपी आवाजों को सुनना चाहा है। मेरी इच्छा रही है कि शब्दों से गुजरते हुए मैं उस बूढ़ी स्त्री की तरह रहूँ, जो रोज शाम चिड़ियों की कोई कविता या कहानी गढ़कर लौटती थी। उसे शायद पता नहीं था कि वह साहित्य रच रही है। उसे इतना भर मालूम था कि बच्चों के लिए एक कहानी बचाकर रखनी चाहिए। मेरी कविताओं में इसलिए बड़ी चीजों के साथ छोटी चीजें भी हैं-मौसंबी, चटनी, छतरी, झाडू, टूटी हुई साइकिल, बच्चे की हँसी, मिट्टी, बारिश और एक मामूली आदमी, जिसके पाँव छोटे हैं, लेकिन जो अपना रास्ता बड़े डगों से नापता है। मुझे लगता है कि दुनिया बड़ी चीजों से कम और छोटी चीजों से अधिक बनी है। एक रती भर प्रेम कभी-कभी धरती के सारे वैभव पर भारी पड़ जाता है। मनुष्य को बचाने के लिए हमेशा बड़ी-बड़ी चीजों की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी बस थोड़ी -सी जगह चाहिए, जहाँ कोई डरा हुआ आदमी अपना सिर छिपा सके। मेरे लिए सभ्यता ऊँची इमारतों का नाम नहीं है। सभ्यता शायद वह छोटी -सी जगह है, जहाँ कोई भयभीत जीव कुछ देर सुरक्षित महसूस कर सके। हिंसा सबसे पहले इसी जगह को नष्ट करती है। वह मनुष्य से उसका घर ही नहीं, उसके भीतर छिप सकने की जगह भी छीन लेना चाहती है। शायद कविता भी मनुष्य की ऐसी ही एक जगह है, जहाँ वह अपने नाम, पद, परिचय, उपलब्धियों और असफलताओं से बाहर बैठ सके। हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जहाँ शोर बहुत है और सुनना कमः सूचनाएं बहुत हैं और अनुभव कम, शब्द बहुत हैं और अर्थ कम होते जा रहे हैं। ऐसे समय में कविता मेरे लिए प्रश्न बचाए रखने की छोटी -सी जिद है। मैं प्रश्नों के उत्तर देने वाला कवि होने का दावा नहीं करता। मुझे प्रश्न बचाने वाला कवि होना अधिक जरूरी लगता है। जिस दिन मनुष्य प्रश्न पूछना छोड़ देगा, उसके भीतर कविता के लिए बची हुई जगह भी छोटी पड़ने लगेगी। मुझे आम आदमी बहुत प्रिय है। उसे पीढ़ियों के लिए सब कुछ बटोर लेने का अर्थशास्त्र नहीं आता। लेकिन उसे भूख लगती है, थकान होती है, वह प्रेम करता है, अपने बच्चों के लिए कुछ बचाकर रखता है, गिरता है और फिर उठता है। शायद इसी में उसका असली जान छिपा है। मैं चाहता हूँ कि कविता इसी आदमी के साथ चले। उसके जूते में घुसी मिट्टी को पहचाने, उसकी जेब में रखे सिक्के की खनक सुने और घर लौटते समय उसकी थकान को समझे। जब वह अपनी टूटी हुई साइकिल धकेलते हुए घर पहुँचता है, तब कविता को यह भी समझना चाहिए कि रास्ता छोटा था, लेकिन यात्रा बड़ी। मैंने उपलब्धियों को बहुत पास से देखा है और उनसे थोड़ा दूर रहने की कोशिश भी की है। कभी-कभी उपलब्धियां इतनी बड़ी हो जाती हैं कि पड़ोसी के ऑसू दिखाई देना बंद हो जाते हैं। इसलिए मुझे अपनी उपलब्धियों से थोड़ा डर लगता है- कहीं वे मेरी आँखों की रोशनी न खा जाएं। मुझे छोटी चीजों पर भरोसा है-एक कटोरी चटनी पर, एक पुरानी उतरी पर, एक झाडू पर, एक पड़ोसी पर और एक अदद दोस्त पर। झाडू मेरे लिए केवल घर साफ करने की वस्तु नहीं है। वह समाज के उस अदृश्य हिस्से का प्रतीक है, जिसे सभ्य दुनिया उपयोग तो करती है, लेकिन सम्मान नहीं देती। मैं चाहता हूँ कि कविता भी झाडू की तरह हो। वह वहाँ जाए, जहाँ गंदगी है: और सफाई करते हुए यदि कोई खोई हुई चीज मिल जाए, तो उसे सँभालकर रख ले। शायद कविता का काम यही है जो खो गया है, उसका नाम याद रखना। मेरी कविताओं में स्त्रियां हैं, बच्चे हैं, पेड़ हैं, नदियों हैं और जंगल हैं। प्रकृति मेरे लिए केवल सुंदर दृश्य नहीं, हमारी स्मृति है। जंगल मेरे लिए पेड़ों की संख्या नहीं है। वह मनुष्य से पहले का मनुष्य है। वहाँ मिट्टी में इतिहास है, पतियों में भाषा है और पक्षियों में लोकगीत हैं। मेरी स्मृति में एक दादी चुल्लू भर मिट्टी उठाकर कहती है कि यह मिट्टी नहीं, हमारे पुरखों की हड्डियां हैं, जो आकाश से धरती में लौट रही हैं। बच्चे उसी मिट्टी से छोटे-छोटे तारे बनाते हैं और दादी रात में उन्हें फिर आकाश में टांग आती हैं। यह मेरे लिए केवल कविता का दृश्य नहीं, स्मृति का एक ढंग है -मिट्टी से आकाश तक और आकाश से मिट्टी तक आते-जाते पुरखों का एक चक्र। इसलिए जंगल मेरे लिए बाहर नहीं है। उसका थोड़ा हिस्सा मेरे भीतर भी है। जब जंगल कटता है, तो मेरे भीतर कुछ कम होता है। जब नदी सूखती है, तो मेरे भीतर कोई पुराना शब्द सूख जाता है। मेरी चिंता केवल पर्यावरण की चिंता नहीं, मनुष्य के भीतर बची हुई प्रकृति की चिंता भी है। मैं कहता हूँ-गिरूँगा तो उठूंगा। यह किसी नायक का विश्वास नहीं है। यह एक मामूली चीज का विश्वास है, जो गिरने पर पेड़ की तरह फिर उठना चाहती है और बढ़ने पर छाँव बांटना चाहती है। मैं कविता में बहुत ऊंचा नहीं उठना चाहता। पेड़ की तरह उठना चाहता हूँ। ऊपर जाऊं तो किसी के लिए छाँव बनूँ और यदि कभी गिरूँ, तो मेरी लकड़ी से किसी का चूल्हा जल सके। शायद मनुष्य होने की मेरी सबसे छोटी और सबसे बड़ी आकांक्षा यही है। मैं डरता हूँ कि कहीं मेरे शब्द मेरे जीवन से बड़े न हो जाएं। कहीं वे इतने चमकदार न हो जाएं कि उनमें आदमी दिखाई ही न दे। इसलिए शब्द मेरे लिए हथियार से अधिक आश्रय हैं। वे किसी पर विजय पाने के लिए नहीं, किसी के पास बैठने के लिए है-कभी किसी दोस्त के लिए, कभी किसी मृत कवि के लिए और कभी किसी ऐसे आदमी के लिए, जिसका नाम तक मुझे मालूम नहीं। अक्सर मैं अकेला उपस्थित रहता हूँ लेकिन मेरे आसपास कोई न कोई आकर उपस्थित हो जाता है। पूर्वज, परिजन, पड़ोसी और प्रिय मित्र-इन सबको मैं दुनिया के अच्छे लोगों का पासवर्ड कहता हूँ। इनके पास होने से अनुपस्थिति की आशंका मिट जाती है और मेरी अपनी दुनिया की पाठशाला में उस दिन की हाजिरी लग जाती है। कविता मेरे लिए चलते रहने की जगह है। जहाँ रास्ते समाप्त होते हैं, शायद वहीं से कविता शुरु होती है। और जहाँ कविता समाप्त होती है, वहाँ मनुष्य का कोई अनकहा दुःख अब भी बचा रहता है-जैसे कविता के बाद भी जीवन को कुछ कहना बाकी हो। आज सिलीगुडी में, पत्रिका-‘आपका तीस्ता-हिमालय’ द्वारा सम्मानित किए जाने के इस आत्मीय अवसर पर, मैं अपने भीतर के कवि को देखता हूँ तो मुझे कोई ऐसा व्यक्ति नहीं दिखाई देता, जिसने कविता को पूरी तरह जान लिया हो। मुझे तो अब भी वही आदमी दिखाई देता है, जो मिट्टी में कुछ खोज रहा है, किसी पेड़ के नीचे थोड़ी देर बैठना चाहता है और किसी अनसुने दुःख की आवाज तक पहुँचने की कोशिश कर रहा है। मैं इस सम्मान को केवल अपनी कविताओं का सम्मान नहीं मानता। इसमें उन तमाम लोगों, स्मृतियों और अनुभवों की उपस्थिति देखता हूँ, जिनसे मेरी कविता बनी है-उस मिट्टी की, जिसने मुझे स्मृति दी; उन लोगों की, जिन्होंने मुझे मनुष्य बने रहना सिखाया; और उन पाठकों की, जिन्होंने मेरे शब्दों में अपने जीवन की कोई छोटी -सी जगह खोजी। तीस्ता और हिमालय के इस भूगोल में खड़े होकर मैं अपने उस भूगोल को भी याद कर रहा हूँ, जहाँ मिट्टी, जंगल, बारिश और लोक-स्मृतियां मेरी भाषा में उतरती रही हैं। नदियों और पहाड़ हमें सिखाते हैं कि बहते रहना और ऊंचा होना तभी सार्थक है, जब हमारे होने से किसी दूसरे के जीवन में थोड़ी जगह, थोड़ी छाँव और थोड़ा भरोसा पैदा हो। मैं इस सम्मान को एक नई जिम्मेदारी की शुरुआत मानता हूँ। सम्मान के बाद भी कवि को अपने शब्दों के सामने उतना ही जिज्ञासु और ईमानदार होना पड़ता है, जितना वह पहली कविता लिखते समय था। मैं आज इस सम्मान के सामने किसी उपलब्धि की तरह नहीं, एक संभावना की तरह उपस्थित होना चाहता हूँ- एक ऐसे मनुष्य की संभावना, जो अभी सीख रहा है कि दूसरे मनुष्य के दुःख के पास कैसे बैठा जाए। मेरे भीतर वह बच्चा बचा रहे, जो मिट्टी से तारा बनाता है। वह दादी बची रहे, जो रात में उसे आकाश में टांग आती है: वह पेड़ बचा रहे, जो गिरकर भी छाँव देने का सपना देखता है; और वह शब्द बचा रहे, जो किसी पुराने घोंसले में किसी नई चिड़िया के आने की जगह बनाए रखता है। मैं इसी अधूरेपन, इसी उम्मीद और इसी बची हुई मनुष्यता के साथ पत्रिका ‘आपका तीस्ता-हिमालय’ के प्रति अपनी आत्मीय कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। बहुत-बहुत धन्यवाद ! -जय प्रकाश मानस
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