पंजाब लंबे समय से नशे की गंभीर समस्या से जूझ रहा है।
सीमावर्ती राज्य होने के कारण यह अफगानिस्तान-पाकिस्तान-ईरान के गोल्डन क्रेसेंट क्षेत्र से आने वाले हेरोइन और अन्य नशीले पदार्थों का मुख्य मार्ग रहा है। हाल के वर्षों में ड्रोन के जरिए सीमा पार तस्करी में वृद्धि देखी गई है। साथ ही, अन्य राज्यों से आने वाली फार्मास्युटिकल दवाओं का दुरुपयोग भी तेजी से बढ़ा है। यह समस्या केवल पंजाब तक सीमित नहीं है। राजस्थान, जम्मू-कश्मीर और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में भी इसी तरह के खतरे मौजूद हैं। युवाओं की एक पीढ़ी प्रभावित हो रही है, परिवार टूट रहे हैं और सामाजिक ढाँचा कमजोर पड़ रहा है। नशीले पदार्थों की आपूर्ति का स्वरूप बदल रहा है। सीमा पर कड़े निगरानी और एंटी-ड्रोन उपायों के बावजूद तस्करी जारी है। साथ ही, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों से आने वाली टैबलेट्स और कैप्सूल पंजाब में उपलब्धता बढ़ा रहे हैं। इनमें ओपिऑइड और अन्य मनोविकारक दवाएँ शामिल हैं। ये सस्ती और आसानी से उपलब्ध होने के कारण हेरोइन का विकल्प बन रही हैं। नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की रिपोर्टों के अनुसार पंजाब देश में हेरोइन जब्ती का बड़ा हिस्सा है। यह आँकड़े समस्या की गहराई दिखाते हैं। इसके सामाजिक प्रभाव स्पष्ट हैं। युवाओं में व्यसन बढ़ रहा है, अपराध और हिंसा से जुड़े मामले सामने आ रहे हैं और स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में नशे के कारण परिवारों की आर्थिक स्थिति बिगड़ रही है। हाल के घटनाक्रम में नशे के खिलाफ आवाज उठाने वालों की सुरक्षा एक गंभीर मुद्दा बन गई है। मंसा में एंटी-ड्रग एक्टिविस्ट परविंदर सिंह झोटा की हत्या ने इस चिंता को और बढ़ा दिया। वे एक मेडिकल स्टोर पर कथित अवैध बिक्री को लेकर सवाल कर रहे थे और घटना को लाइव प्रसारित कर रहे थे। पुलिस ने इसे व्यक्तिगत दुश्मनी बताया, लेकिन विपक्षी दलों ने कानून-व्यवस्था और व्हिसलब्लोअर्स की सुरक्षा पर सवाल उठाए। ऐसी घटनाएँ पहली नहीं हैं। अतीत में भी नशे के खिलाफ काम करने वाले लोगों को धमकी, हमले या अन्य दबावों का सामना करना पड़ा है। जब आम नागरिक या स्थानीय कार्यकर्ता सूचना देते हैं या कार्रवाई की माँग करते हैं, तो उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होने से डर का माहौल बनता है। इससे जानकारी का प्रवाह रुकता है और नेटवर्क मजबूत होते हैं। व्हिसलब्लोअर संरक्षण कानून और स्थानीय स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है। इस समस्या का मूल्यांकन किया जाए तो यह पता चलता है कि समस्या केवल बाहरी तस्करी तक सीमित नहीं है। कई रिपोर्टों और अदालती टिप्पणियों में पुलिस और प्रशासन के कुछ स्तरों पर मिलीभगत या लापरवाही के आरोप लगे हैं। बड़े तस्करों के खिलाफ कार्रवाई में देरी, सबूतों का कमजोर होना या कुछ मामलों में कर्मी की संलिप्तता की खबरें समय-समय पर आती रही हैं। यह पूरी व्यवस्था की विफलता नहीं है, लेकिन कमजोर कड़ियाँ मौजूद हैं। जब स्थानीय नेटवर्क पुलिस या प्रशासन के कुछ लोगों से जुड़े होते हैं, तो बड़े आपूर्तिकर्ताओं तक पहुँचना मुश्किल हो जाता है। वहीं इस मामले में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी भी स्पष्ट है। हर चुनाव में नशे का मुद्दा प्रमुख बनता है। विभिन्न दलों ने समय-सीमा तय करके नशामुक्त पंजाब का वादा किया, लेकिन परिणाम अपेक्षित नहीं रहे। समस्या को चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जबकि दीर्घकालिक, निरंतर और गैर-राजनीतिक कार्रवाई कमजोर पड़ जाती है। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच जिम्मेदारी का आरोप-प्रत्यारोप भी समाधान में बाधा डालता है। सीमा सुरक्षा केंद्र की जिम्मेदारी है, जबकि राज्य में वितरण और खपत पर नियंत्रण राज्य सरकार का काम है। दोनों के समन्वय के बिना प्रगति सीमित रहती है। ऐसे में समस्या को हल करने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण चाहिए।सबसे पहले, सीमा सुरक्षा को और मजबूत करना जरूरी है। ड्रोन निगरानी, खुफिया साझाकरण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से सीमा पार आपूर्ति कम की जा सकती है। साथ ही, अन्य राज्यों से आने वाली फार्मास्युटिकल दवाओं पर नज़र रखने के लिए अंतरराज्यीय समन्वय बढ़ाना होगा। फार्मेसियों की निगरानी और अवैध बिक्री पर सख्त कार्रवाई जरूरी है। दूसरा, प्रवर्तन के साथ-साथ पुनर्वास पर जोर देना चाहिए। नशे के आदी लोगों को अपराधी नहीं, मरीज के रूप में देखा जाना चाहिए। डि-एडिक्शन केंद्रों की संख्या और गुणवत्ता बढ़ाना, आउटरीच कार्यक्रम चलाना और रोजगार के अवसर देना महत्वपूर्ण है। बेरोजगारी और सामाजिक दबाव नशे की जड़ें हैं, इसलिए युवाओं के लिए कौशल विकास और आर्थिक विकल्प आवश्यक हैं। तीसरा, व्हिसलब्लोअर्स और स्थानीय कार्यकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। उनकी सूचना पर त्वरित और गोपनीय कार्रवाई, कानूनी संरक्षण और आवश्यकता पड़ने पर व्यक्तिगत सुरक्षा दी जानी चाहिए। इससे नागरिक भागीदारी बढ़ेगी। चौथा, खुफिया आधारित और लक्षित कार्रवाई करनी चाहिए। बड़े नेटवर्क, धन के स्रोत और उच्च स्तर के तस्करों पर ध्यान केंद्रित करना छोटे स्तर के गिरफ्तारियों से अधिक प्रभावी होगा। वित्तीय जाँच और संपत्ति जब्ती से नेटवर्क कमजोर किए जा सकते हैं। इस गंभीर समस्या के लिए, जागरूकता अभियान स्कूलों, कॉलेजों और समुदायों में चलाने चाहिए। परिवारों को शामिल करना और नशे के खतरों पर वैज्ञानिक जानकारी देना दीर्घकालिक प्रभाव डालता है। पंजाब और सीमावर्ती राज्यों में नशे की समस्या जटिल और बहुस्तरीय है। सीमा पार तस्करी, आंतरिक आपूर्ति श्रृंखलाएँ, सामाजिक-आर्थिक कारक और संस्थागत कमजोरियाँ मिलकर इसे बनाए रखती हैं। हाल की घटनाएँ दिखाती हैं कि जो लोग आवाज उठाते हैं, उन्हें भी खतरा है। राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप से समस्या हल नहीं होती। समाधान के लिए लगातार, समन्वित और पारदर्शी कार्रवाई की जरूरत है। प्रवर्तन, पुनर्वास, आर्थिक विकास और नागरिक सुरक्षा को एक साथ आगे बढ़ाना होगा। जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति चुनावी चक्रों से ऊपर उठकर दीर्घकालिक संस्थागत क्षमता बनाने पर केंद्रित नहीं होगी, समस्या बनी रहेगी। युवाओं का भविष्य और समाज की स्थिरता इस लड़ाई पर निर्भर करती है। -रजनीश कपूर लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।
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