जनवादी पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता गौरी लंकेश की नृशंस हत्या 5 सितंबर 2017 को बेंगलुरु में उस वक्त कर दी गयी थी
जनवादी पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता गौरी लंकेश की नृशंस हत्या 5 सितंबर 2017 को बेंगलुरु में उस वक्त कर दी गयी थी, जब वह काम से अपने घर लौट रही थीं। एक आदमी उनके पास आया; वह मोटरसाइकिल पर सवान था और उसका चेहरा हेलमेट से ढका हुआ था। गौरी लंकेश खतरे को भांप कर अपने घर की ओर भागीं, जो लगभग 10 फीट दूर था। लेकिन तभी उसने पिस्तौल से गोली उन पर चला दी। घर के अंदर पहुँचने से पहले ही वह गिर पड़ीं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि उन्हें दो गोलियाँ छाती में और एक पीठ में लगी थीं। चौथी गोली या तो निशाने से चूक गई या मिसफ़ायर हो गई। सिक्योरिटी कैमरों के फुटेज में मोटरसाइकिल पर सिर्फ़ दो लोग दिखे जो हेलमेट पहने हुए थे। लेकिन पुलिस का कहना था कि दो और लोग हत्या में शामिल थे, जो पहली जोड़ी के पीछे दूसरी मोटरसाइकिल पर सवार थे। लंकेश, जो बेंगलुरु के साप्ताहिक अख़बार गौरी लंकेश पत्रिका की एडिटर और पब्लिशर थीं, एक बेबाक वामपंथी पत्रकार थीं। वह ऐसे भारत में काम कर रही थीं जो 2014 के बाद पत्रकारों के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में से एक बन गया है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के 2017 के प्रेस फ्रीडम इंडेक्स के अनुसार, भारत 180 देशों में 136वें स्थान पर था। यह स्थिति दुनिया के सबसे ज़्यादा आबादी वाले लोकतंत्र के तौर पर भारत की छवि के बिल्कुल उलट है। रॉबर्ट मुगाबे के सत्ता से हटने से पहले ज़िम्बाब्वे 127वें स्थान पर था, जबकि लंबे समय से युद्ध झेल रहे अफ़गानिस्तान का स्थान 120वाँ था। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स के अनुसार, 1992 से अब तक भारत में सैकड़ों पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स के आंकड़ों के मुताबिक़ यह संख्या: 2005 से अब तक 73 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। 2015 में नौ पत्रकारों की हत्या हुई; इनमें से एक को कथित तौर पर रेप के आरोपी एक नेता के लिए काम करने वाले पुलिसवालों ने आग लगाकर मार डाला था। 2016 में पांच पत्रकारों की हत्या हुई। भारतीय मीडिया वॉचडॉग द हूट के मुताबिक़, 2010 से अब तक मारे गए 30 पत्रकारों के मामलों में से सिर्फ़ एक मामले में सज़ा हो पाई है। लेकिन गौरी लंकेश कौन थीं? उनकी हत्या के बाद वे अचानक हर जगह चर्चा में आ गईं—छोटे बालों वाली एक दुबली-पतली महिला, जो कभी जोश से भरी तो कभी गहरी सोच में डूबी हुई नज़र आती थीं। पूरे भारत में विरोध प्रदर्शन और कैंडल मार्च हुए, जिनमें मैं गौरी हूँ लिखे पोस्टर और बड़ी-बड़ी रंग-बिरंगी कठपुतलियाँ दिखाई दीं। उनकी मौत के एक महीने के भीतर ही, उनके काम के लिए उन्हें मरणोपरांत अन्ना पोलितकोवस्काया अवॉर्ड दिया गया, यह अवॉर्ड मॉस्को में 2006 में मारी गईं रूसी पत्रकार की याद में दिया जाता है। दिसंबर तक, दिल्ली के प्रगतिशील पब्लिशिंग हाउस नव्याना ने लंकेश की रचनाओं का एक संग्रह प्रकाशित किया और बैंगलोर की गायिका आरती राव ने सॉन्ग फ़ॉर गौरी जारी किया।
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