-रजनीश कपूर : भारत में हाल के दिनों में आग की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं जो न केवल जान-माल का भारी नुकसान पहुंचा रही हैं बल्कि हमारे प्रशासनिक नियामक और शहरी नियोजन तंत्र की गहरी खामियों को उजागर कर रही हैं।
भारत में हाल के दिनों में आग की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं जो न केवल जान-माल का भारी नुकसान पहुंचा रही हैं बल्कि हमारे प्रशासनिक नियामक और शहरी नियोजन तंत्र की गहरी खामियों को उजागर कर रही हैं। 3 जून 2026 को दिल्ली के मालवीय नगर में एक बेड एंड ब्रेकफास्ट होटल में लगी आग ने 22 लोगों की जान ले लीए जिनमें 12 विदेशी नागरिक शामिल थे। मात्र कुछ सप्ताह बाद 22 जून को लखनऊ के अलीगंज में एक कोचिंग सेंटर वाली इमारत में हुई आग ने कम से कम 15 छात्रों की जान ले ली। इससे पहले कोलकाता में एक रेस्तरां की आग ओडिशा के अस्पताल की घटना और अन्य कई छोटी-बड़ी आग की घटनाएं इस सिलसिले को जारी रखती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार हर साल 13000 से 15000 लोग आग से संबंधित दुर्घटनाओं में जान गंवाते हैं। ये आंकड़े केवल सतही हैं या असली हकीकत तो उन हजारों परिवारों के आंसुओं में छिपी है जो इन घटनाओं का शिकार होते हैं। सवाल है कि क्या ये महज दुर्घटनाएं हैं या सिस्टम की नाकामी दिल्ली के मालवीय नगर की घटना विशेष रूप से चौंकाने वाली है। एक व्यस्त इलाके में बिना फायर क्लियरेंस के चल रहे होटल में आग लगी जहां बचाव के रास्ते अवरुद्ध थे ग्रिल्स लगे हुए थे और इमारत की संरचना नियमों के विपरीत थी। कई पीड़ित ऊपरी मंजिलों से कूदकर बचने की कोशिश में घायल हुए। लखनऊ की घटना भी शॉर्ट सर्किट से शुरू हुई और आग ने ऊपरी मंजिलों पर फंसे छात्रों को जकड़ लिया। डिजिटल लॉक बंद हो गए और फायर एग्जिट व अन्य सेफ्टी साधनों की अनुपस्थिति ने स्थिति को और घातक बना दिया। गौरतलब है कि इन घटनाओं में एक साझा पैटर्न दिखता है। अवैध निर्माण विद्युत ओवरलोडिंग अवरुद्ध निकास मार्ग गैर कार्यशील फायर अलार्म और स्प्रिंकलर सिस्टम तथा प्रशासनिक लापरवाही। अस्पतालों, स्कूलों, कोचिंग सेंटरों, होटलों और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में ऐसी घटनाएं बार.बार हो रही हैं। 2026 में दिल्ली में ही जनवरी से मई तक 45 लोग आग में मारे गए। ये घटनाएं व्यक्तिगत लापरवाही नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता है। सबसे बड़ा दोष निर्माण और सुरक्षा नियमों का उल्लंघन है। नेशनल बिल्डिंग कोड और स्थानीय निर्माण नियम स्पष्ट रूप से फायर एग्जिट फायरप्रूफ सामग्री अलार्म सिस्टम और नियमित ऑडिट की मांग करते हैं लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। भ्रष्टाचार राजनीतिक संरक्षण और आर्थिक दबाव के कारण अवैध मंजूरी मिल जाती हैं। विद्युत सुरक्षा की अनदेखी दूसरी बड़ी समस्या है। पुरानी वायरिंग ओवरलोडेड सर्किटए खराब रखरखाव वाले एसी और अन्य बिजली उपकरणों की गलत हैंडलिंग से शॉर्ट सर्किट आम बात है। वहीं अस्पतालों में ऑक्सीजन सिलेंडर के पास विद्युत उपकरणों का उपयोग और रसोई गैस लीकेज भी जोखिम बढ़ाते हैं। ऐसे में प्रवर्तन तंत्र की कमजोरी सबसे दुर्भाग्यपूर्ण है। फायर विभागों में स्टाफ उपकरण और वाहनों की भारी कमी है। कई शहरों में फायर टेंडर कई इलाकों तक नहीं पहुंच पाते क्योंकि सड़कें संकरी हैं या वहाँ पर अवैध कब्जे हैं। न्यायपालिका के आदेश भी कागजी रह जाते हैं। ठेकेदार मालिक और अधिकारी की मिलीभगत नियमों को दरकिनार करते हैं। परिणामस्वरूप उपहार सिनेमा; 1997 राजकोट गेमिंग जोन गोवा नाइटक्लब जैसी पुरानी त्रासदियों के सबक बड़ी आसानी से भुला दिए जाते हैं। ऐसे हादसों के लिए शहरी नियोजन की खामी भी जिम्मेदार है। घनी आबादी अनियोजित निर्माण और पर्यटनध्शिक्षा हबों में सुरक्षा को नजरअंदाज करना आम है। कोविड के बाद बढ़े मेडिकल टूरिज्म और कोचिंग इंडस्ट्री ने जोखिम और बढ़ाया है। यह सिस्टम नाकामी गरीबों और मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है जो सस्ते विकल्पों पर निर्भर रहते हैं। इन घटनाओं को रोकने के लिए बहुआयामी रणनीति जरूरी है। जैसे किए सख्त कानून और प्रवर्तनरू सभी सार्वजनिक भवनों; होटल अस्पताल स्कूल कोचिंग का अनिवार्य फायर ऑडिट हर छह महीने में हो। बिना छव्ब् के संचालन पर भारी जुर्माना और जेल का प्रावधान हो। मंजूरी प्रक्रिया का सिंगल विंडो सिस्टम डिजिटल और पारदर्शी बने। बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरणरू फायर अलार्म स्प्रिंकलर स्मोक डिटेक्टर और इमरजेंसी लाइट्स अनिवार्य की जाएँ। पुरानी इमारतों में रेट्रोफिटिंग के लिए सब्सिडी दी जाए। फायर टेंडरों के लिए चौड़ी सड़कें और पीसीआर की तरह शहर के प्रमुख स्थानों पर तैनाती हो जिससे आग लगने की स्थिति में जल्द से जल्द पहुँचा जा सके। जागरूकता और प्रशिक्षण स्कूलों कॉलेजों और कार्यस्थलों पर नियमित फायर ड्रिल हो। नागरिकों को फायर एक्सटिंग्विशर उपयोग की ट्रेनिंग दी जाए। मीडिया और सोशल मीडिया अभियान भी चलाए जाएँ। तकनीकी समाधान रूप आधारित फायर डिटेक्शन सिस्टम स्मार्ट सिटी इंटीग्रेशन और ड्रोन आधारित निगरानी की जाए। विद्युत विभागों के साथ समन्वय से ओवरलोडिंग रोकी जाए। जिम्मेदारी तय करना लापरवाही पर अधिकारियों, मालिकों और ठेकेदारों के खिलाफ तुरंत विभागीय कार्रवाई की जाए। इतना ही नहीं मुआवजा के साथ-साथ दोषियों की संपत्ति भी जब्त की जाए। फंडिंग और क्षमता निर्माण सरकार को चाहिए कि फायर सेवाओं को बजट बढ़ाएँ आधुनिक उपकरण और प्रशिक्षण पर ज़ोर दिया जाए। केंद्रीय और राज्य डिजास्टर मैनेजमेंट को और मजबूत किया जाए। गौरतलब है कि इन उपायों को लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और जन दबाव जरूरी है। तभी ज़मीनी स्तर पर कुछ नज़र आएगा। उल्लेखनीय है कि दुनिया के कई देशों ने ऐसी त्रासदियों से सीखकर अपनी व्यवस्था सुधारी है। यूनाइटेड किंगडम में 2017 के ग्रेनफेल टावर हादसे में 72 मौतों के बाद वहाँ पर बिल्डिंग सेफ्टी एक्ट 2022 लाया गया। इसमें जिम्मेदार व्यक्ति की नियुक्ति कड़े मटेरियल स्टैंडर्ड और स्वतंत्र ऑडिट अनिवार्य हैं। भारत को भी इसी तर्ज पर स्वतंत्र फायर सेफ्टी अथॉरिटी बनानी चाहिए। सिंगापुर और जापान में सख्त भवन कोड नियमित फायर ड्रिल और कम्युनिटी लेवल जागरूकता से आग की घटनाएं न्यूनतम हैं। जापान में भूकंप प्रतिरोधी और फायर, रेटार्डेंट निर्माण मानक आदर्श हैं। अमेरिका में नेशनल फायर प्रोटेक्शन एसोसिएशन; और ऑक्यूपेशनल सेफ्टी एंड हेल्थ एडमिनिस्ट्रेशन; वैध नियमों से औद्योगिक और सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है। ऑस्ट्रेलिया में रिस्क असेसमेंट आधारित अप्रोच अपनाया जाता है। भारत को भी इन देशों से सीखना चाहिए। आग की ये घटनाएं भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था और शहरीकरण के बीच खड़ी दीवार हैं। अगर हम सिस्टम को सुधारने में असफल रहे तो विकास का सपना अधूरा रहेगा। मालवीय नगर और लखनऊ जैसी घटनाएं चेतावनी हैं। सरकार प्रशासनए नागरिक समाज और मीडिया को मिलकर काम करना होगा। सख्त कानून प्रभावी कार्यान्वयन जागरूकता और जवाबदेही से हम इन त्रासदियों को रोके जा सकते हैं। लेखक दिल्ली स्थित कालचक्र समाचार ब्यूरो के संपादक हैं।
Copyright @2020 The Sun Express