विशेष प्रतिनिधि,आपका तिस्ता-हिमालय : भारतीय समाज में सट्टा केवल जुए की प्रवृत्ति नहीं रहा; वह लंबे समय तक सामाजिक असुरक्षा, आर्थिक अभाव और अचानक जीवन बदल जाने की आकांक्षा का प्रतीक बना रहा।
भारतीय समाज में सट्टा केवल जुए की प्रवृत्ति नहीं रहा; वह लंबे समय तक सामाजिक असुरक्षा, आर्थिक अभाव और अचानक जीवन बदल जाने की आकांक्षा का प्रतीक बना रहा। मुंबई की मिल मजदूर बस्तियों से लेकर मध्य भारत के छोटे कस्बों तक मटका और सट्टे ने एक ऐसी समानांतर संस्कृति विकसित की, जिसमें गरीबी, उम्मीद, अंधविश्वास, मनोरंजन और विनाश-सब एक साथ मौजूद थे। आज जब मटका शब्द सुनाई देता है तो प्रायः मुंबई के अंडरवर्ल्ड, रतन खत्री या अपराध कथाओं की छवि उभरती है। हालांकि रतन खत्री पर बनी लोकप्रिय सामग्री-फिल्में, वेब सीरीज़ और टीवी चर्चाएँ-अधिकतर मिथकीय और नाटकीय प्रस्तुति हैं। गंभीर अकादमिक या खोजी जीवनी का अभाव आज भी बना हुआ है। लेकिन मटका और सट्टे का वास्तविक सामाजिक इतिहास इससे कहीं अधिक व्यापक और जटिल है। यह इतिहास भारतीय श्रमिक वर्ग, कस्बाई अर्थव्यवस्था और उस मनोविज्ञान से जुड़ा है जिसमें मेहनत से अधिक भाग्य पर भरोसा पैदा होने लगता है। मुंबई का इतिहास केवल उद्योगों, फिल्मों और समुद्र का इतिहास नहीं है; वह श्रम, विस्थापन, गरीबी और सपनों का भी इतिहास है। बीसवीं सदी के मध्य में जब मुंबई कपड़ा मिलों का विशाल औद्योगिक नगर बन रही थी, तब हजारों मजदूर महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और दक्षिण भारत के अन्य हिस्सों से रोज़गार की तलाश में यहाँ आए। मिलों में काम कठिन था, मजदूरी सीमित थी और जीवन अत्यंत असुरक्षित। चॉलों के छोटे कमरों में बड़े परिवार रहते थे और भविष्य की कोई निश्चितता नहीं थी। इसी वातावरण में मटका लोकप्रिय हुआ। आरंभ में यह कपास व्यापार से जुड़ी सट्टेबाजी थी। न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज और बॉम्बे कॉटन एक्सचेंज के भावों पर दांव लगाए जाते थे। बाद में यह पूरी तरह अंकों के खेल में बदल गया। पर्चियाँ मटके से निकाली जाने लगीं और मटका नाम प्रचलित हुआ। रतन खत्री के न्यू वरली मटका और कल्याणजी भगत के कल्याण मटका ने इसे संगठित रूप दिया। कहा जाता है कि 1980 और 1990 के दशक तक मटका कारोबार का मासिक लेन-देन सैकड़ों करोड़ रुपये तक पहुँच गया था। लेकिन मटका की असली शक्ति उसकी सामाजिक पहुँच में थी। यह अमीरों का कैसीनो नहीं था; यह गरीब आदमी का जुआ था। एक मजदूर, रिक्शाचालक, कुली या छोटा दुकानदार भी दो आने, चार आने, आठ आने या एक रुपये का दांव लगा सकता था। उस दौर में रुपया गरीब आदमी के लिए बड़ी रकम था। कई जगह मजदूर की दैनिक मजदूरी पाँच-दस रुपये से अधिक नहीं होती थी। ऐसे में चार आने का सट्टा भी जोखिम था, लेकिन उसी में किस्मत बदलने की संभावना दिखाई देती थी। 1970 के दशक तक मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर भारत के अनेक कस्बों में सट्टा लगभग लोकसंस्कृति का हिस्सा बन चुका था। चाय की दुकानों, पान ठेलों और बाजारों में ओपन और क्लोज के नंबरों की चर्चा होती थी। लोग सपनों से अंक निकालते थे। कोई कहता-साँप दिखा तो यह नंबर, पानी दिखा तो दूसरा। दुर्घटनाएँ, तारीखें, धार्मिक संकेत, यहाँ तक कि किसी के बोले गए शब्द भी “फीगर” बन जाते थे। यह केवल अंधविश्वास नहीं था; यह असुरक्षित समाज की मनःस्थिति थी। जिन लोगों के पास पूँजी नहीं थी, अवसर नहीं थे और भविष्य की कोई स्थिरता नहीं थी, उनके लिए सट्टा एक मानसिक सहारा बन जाता था। गरीब आदमी को लगता था कि शायद आज का छोटा दांव कल की बड़ी राहत बन जाए। इसी कारण सट्टा कई बार मनोरंजन और सामाजिक मेलजोल का माध्यम भी बन जाता था। शाम को लोग इकट्ठा होकर नंबरों पर चर्चा करते, अपने फॉर्मूले बताते और पुराने हिट याद करते। कस्बों की भाषा में पाना, जोड़ी, कट, सिंगल और डबल जैसे शब्द सामान्य बातचीत का हिस्सा बन गए थे। मटका केवल जुए तक सीमित नहीं रहा; वह लोकभाषा, फिल्मों और रोज़मर्रा की संस्कृति में प्रवेश कर गया। लेकिन इस संस्कृति का दूसरा चेहरा बेहद त्रासद था। मजदूरों की मजदूरी सट्टे में डूबती थी। घरों में तनाव पैदा होता था। स्त्रियों के गहने बिकते थे। छोटे दुकानदार कर्ज में फँसते थे। कई परिवारों की आर्थिक रीढ़ टूट जाती थी। समाज के गरीब तबके, जो पहले ही असुरक्षित थे, और अधिक अस्थिर हो जाते थे। यहीं से सट्टा धीरे-धीरे अपराध जगत से जुड़ने लगा। मुंबई में मटका नेटवर्क और अंडरवर्ल्ड के बीच संबंध बने। पुलिस संरक्षण, राजनीतिक संपर्क और अवैध धन का तंत्र विकसित हुआ। रतन खत्री जैसे लोग लोककथाओं और अपराध इतिहास दोनों का हिस्सा बन गए। वे केवल सट्टेबाज नहीं रहे; वे उस दौर की शहरी मिथक-व्यवस्था के पात्र बन गए। 1982 की ऐतिहासिक मुंबई मिल हड़ताल और उसके बाद कपड़ा उद्योग के पतन ने इस संस्कृति को निर्णायक रूप से बदल दिया। दत्ता सामंत के नेतृत्व में हुई लंबी हड़ताल के बाद मुंबई की कपड़ा मिलें धीरे-धीरे बंद होने लगीं। लाखों मजदूर बेरोजगार हुए। मिल मजदूरों की सामूहिक संस्कृति कमजोर पड़ी और उसकी जगह तेजी से उपभोक्तावाद तथा त्वरित धन की मानसिकता ने लेना शुरू किया। कई शोधकर्ताओं का मानना है कि मिलों के पतन के साथ ही अपराध, रियल एस्टेट और अवैध अर्थव्यवस्था का विस्तार तेज हुआ। पुराने मिल इलाकों में अंडरवर्ल्ड और सट्टा नेटवर्क और मजबूत हुए। यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है-क्या शेयर बाज़ार और पुराना सट्टा पूरी तरह अलग चीजें हैं? सैद्धांतिक रूप से शेयर बाज़ार उत्पादन और निवेश की अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। कंपनियां पूंजी जुटाती हैं, उद्योग विस्तार करते हैं और निवेशक लाभांश प्राप्त करते हैं। लेकिन व्यवहार में शेयर बाजार का एक बड़ा हिस्सा अब अटकलों और त्वरित लाभ की मानसिकता से संचालित होने लगा है। खासकर इंट्राडे ट्रेडिंग, ऑप्शन ट्रेडिंग और क्रिप्टो जैसी प्रवृत्तियों ने इसे कई बार पुराने सट्टे के आधुनिक संस्करण में बदल दिया है। आज भी यह प्रश्न प्रासंगिक है कि आखिर सट्टा समाज में इतना गहरा क्यों पैठता है। इसका उत्तर केवल लोभ में नहीं है। जहाँ आर्थिक असमानता अधिक होती है, रोज़गार असुरक्षित होते हैं और सामाजिक गतिशीलता सीमित होती है, वहाँ लोग भाग्य पर अधिक निर्भर होने लगते हैं। सट्टा उसी मनोविज्ञान का आर्थिक रूप है। भारतीय समाज में मटका और सट्टे का इतिहास इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वह हमें केवल अपराध या जुए की कहानी नहीं सुनाता; वह श्रमिक जीवन, कस्बाई संस्कृति, विस्थापन, आर्थिक असुरक्षा और सपनों की राजनीति का इतिहास भी बताता है। यह उस समाज का दर्पण है जहाँ मेहनत और अवसर के बीच की दूरी इतनी बढ़ जाती है कि लोग भाग्य को ही सबसे बड़ा सहारा मानने लगते हैं। इस दृष्टि से मटका केवल एक अवैध खेल नहीं था; वह भारतीय समाज की आर्थिक बेचैनी और सांस्कृतिक मनोविज्ञान की गहरी अभिव्यक्ति था। आज ऑनलाइन बेटिंग और मोबाइल ऐप्स के दौर में वह पुराना कस्बाई सट्टा भले बदल गया हो, लेकिन मानसिकता कहीं-कहीं वही है—कम पूँजी से अचानक बड़ी रकम पाने का सपना। फर्क केवल इतना है कि तब पान की दुकान पर पर्ची कटती थी, आज मोबाइल स्क्रीन पर दांव लगता है। दरअसल, सट्टे से शेयर बाजार तक की यात्रा केवल आर्थिक परिवर्तन की कहानी नहीं है; यह भारतीय समाज की बदलती मानसिकता की कहानी भी है। यह उस समाज का चित्र है जिसमें असमानता बढ़ रही है, रोजगार अस्थिर हो रहे हैं और लोग स्थायी परिश्रम की तुलना में त्वरित सफलता की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं। 1990 के बाद उदारीकरण, सैटेलाइट टीवी और क्रिकेट के व्यावसायीकरण ने पारंपरिक मटका को नया रूप दिया। क्रिकेट सट्टा, बाद में ऑनलाइन बेटिंग और मोबाइल ऐप्स ने उसी मानसिकता को डिजिटल दुनिया में पहुँचा दिया। फर्क सिर्फ इतना था कि पहले पान की दुकान पर पर्ची कटती थी, अब मोबाइल स्क्रीन पर दांव लगता है। उदारीकरण के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था बदलने लगी। 1990 के दशक में बाजारवादी नीतियों ने वित्तीय पूंजी को नई शक्ति दी। शेयर बाज़ार अब केवल बड़े उद्योगपतियों और दलाल स्ट्रीट तक सीमित नहीं रहा। टेलीविजन चैनलों, अखबारों और बाद में मोबाइल ऐप्स ने निवेश को जन-संस्कृति में बदलना शुरू किया। अब सट्टा अवैध गलियों से निकलकर वैध वित्तीय संस्थानों के भीतर प्रवेश कर चुका था। पुराने समय का मटका गरीब आदमी का सपना था; आज का शेयर बाजार मध्यवर्गीय आकांक्षा का नया मंच बन गया है। फर्क केवल इतना है कि पहले सट्टा अंधेरी गलियों में चलता था, अब वह चमकदार स्क्रीन पर दिखाई देता है।
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