पश्चिम बंगाल के रानीगंज में महापंडित राहुल सांकृत्यायन की आदमकद प्रतिमा को 12 जुलाई 2026 की रात जेसीबी मशीन की सहायता से उसके आधार सहित उखाड़कर हटाए जाने की घटना केवल एक स्मारक को क्षति पहुँचाने का मामला नहीं है।
पश्चिम बंगाल के रानीगंज में महापंडित राहुल सांकृत्यायन की आदमकद प्रतिमा को 12 जुलाई 2026 की रात जेसीबी मशीन की सहायता से उसके आधार सहित उखाड़कर हटाए जाने की घटना केवल एक स्मारक को क्षति पहुँचाने का मामला नहीं है। यदि उपलब्ध तथ्यों के अनुसार यह कार्रवाई सुनियोजित ढंग से की गई, तो यह भारतीय लोकतांत्रिक चेतना, सार्वजनिक स्मृति और प्रगतिशील वैचारिक विरासत पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाने वाली घटना है। किसी प्रतिमा का ध्वंस केवल पत्थर या धातु को नष्ट करना नहीं होता; वह उन विचारों, मूल्यों और ऐतिहासिक स्मृतियों पर भी प्रहार होता है जिनका वह प्रतीक होती है। इसीलिए ऐसी घटनाओं का मूल्यांकन केवल कानून-व्यवस्था के सामान्य प्रश्न के रूप में नहीं किया जा सकता। इनके सामाजिक, राजनीतिक और वैचारिक निहितार्थ कहीं अधिक गहरे होते हैं। महापंडित राहुल सांकृत्यायन भारतीय बौद्धिक परंपरा के उन विरल व्यक्तित्वों में हैं जिन्होंने ज्ञान को सीमाओं में नहीं बाँधा। इतिहास, पुरातत्त्व, दर्शन, भाषा, यात्रा, बौद्ध अध्ययन, समाजवाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण—इन सब क्षेत्रों में उनका योगदान अद्वितीय है। उन्होंने भारतीय समाज को अंधविश्वास, रूढ़ियों और मानसिक दासता से मुक्त करने का आह्वान किया। उनका प्रसिद्ध आह्वान— "भागो नहीं, दुनिया को बदलो" —आज भी सामाजिक परिवर्तन में विश्वास रखने वाले लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है। इसलिए राहुल की प्रतिमा पर हमला, उनके विचारों और उस बौद्धिक परंपरा पर हमला माना जाएगा, जिसने भारतीय समाज को तर्क, विवेक और परिवर्तन का रास्ता दिखाया। इतिहास बताता है कि विचारों से भयभीत शक्तियाँ सबसे पहले स्मृतियों पर आक्रमण करती हैं। वे पुस्तकें जलाती हैं, प्रतिमाएँ गिराती हैं, इतिहास को बदलने का प्रयास करती हैं और सार्वजनिक स्मृति पर अपना एकाधिकार स्थापित करना चाहती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें विश्वास होता है कि यदि समाज की स्मृति पर नियंत्रण स्थापित कर लिया जाए, तो वर्तमान और भविष्य दोनों को नियंत्रित किया जा सकता है। इसलिए प्रतिमाओं, पुस्तकालयों, विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक संस्थानों पर होने वाले हमले केवल प्रतीकों पर हमले नहीं होते; वे समाज की वैचारिक स्वतंत्रता पर आक्रमण होते हैं। रानीगंज की घटना को इसी व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि एक व्यस्त राजमार्ग के निकट स्थापित लगभग नौ फुट ऊँची प्रतिमा को भारी मशीनों की सहायता से हटाया गया और प्रशासन को इसकी जानकारी तक नहीं हुई। यदि घटना से पहले क्षेत्र की बिजली बाधित हुई, सीसीटीवी कैमरे निष्क्रिय रहे और पुलिस की उपस्थिति नहीं थी, तो यह एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जाँच का विषय है। लोकतांत्रिक शासन की पहली जिम्मेदारी यह है कि वह ऐसे मामलों में तथ्यों को सामने लाए और दोषियों को कानून के दायरे में लाए। अन्यथा जनविश्वास कमजोर होता है और संदेह की राजनीति मजबूत होती है। यह पहली घटना नहीं है जिसने इस प्रकार की आशंकाओं को जन्म दिया है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद मुर्शिदाबाद जिले के जियागंज में स्थापित व्लादिमीर लेनिन की प्रतिमा को भी उन्मादी भीड़ द्वारा गिराए जाने की घटना व्यापक चर्चा का विषय बनी थी। दोनों घटनाओं के बीच समानता केवल प्रतिमाओं के ध्वंस की नहीं है। दोनों ही मामलों में निशाना ऐसे व्यक्तित्व बने जिनका संबंध समाजवादी, प्रगतिशील अथवा वामपंथी विचारधारा से रहा है। इससे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या सार्वजनिक जीवन में वैचारिक असहिष्णुता बढ़ रही है? क्या असहमति के प्रति लोकतांत्रिक धैर्य लगातार कम हो रहा है? इन प्रश्नों पर गंभीर विमर्श की आवश्यकता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी बहुलता है। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता; वह विचारों की विविधता, असहमति के सम्मान और संवाद की संस्कृति पर आधारित होता है। किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में विभिन्न विचारधाराएँ समान रूप से अस्तित्व में रहती हैं। वे एक-दूसरे से बहस करती हैं, आलोचना करती हैं, लेकिन एक-दूसरे के अस्तित्व को समाप्त करने का प्रयास नहीं करतीं। जब किसी समाज में विचारों का उत्तर तर्क से नहीं, बल्कि हिंसा, भय और प्रतीकों के विनाश से दिया जाने लगे, तब लोकतांत्रिक संस्कृति संकट में पड़ जाती है। फासीवाद का ऐतिहासिक अध्ययन हमें यही सिखाता है। फासीवाद केवल एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक मानसिकता भी है। उसमें राष्ट्र को व्यक्ति से ऊपर रखा जाता है, सत्ता को सर्वोच्च मान लिया जाता है और असहमति को राष्ट्रविरोध घोषित करने की प्रवृत्ति विकसित होती है। उसमें विविधता की अपेक्षा एकरूपता को महत्व दिया जाता है। वह एक राष्ट्र, एक संस्कृति, एक भाषा और एक विचार की अवधारणा को आदर्श मानता है। परिणामस्वरूप समाज के भीतर मौजूद बहुलता, संवाद और आलोचनात्मक विवेक को खतरा उत्पन्न होता है। इटली में बेनिटो मुसोलिनी और जर्मनी में एडोल्फ हिटलर के शासनकाल ने यह स्पष्ट कर दिया कि फासीवादी राजनीति का पहला निशाना स्वतंत्र चिंतन होता है। विश्वविद्यालयों, लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों और वैज्ञानिकों पर नियंत्रण स्थापित किया जाता है। इतिहास का पुनर्लेखन किया जाता है। असहमति को देशद्रोह या षड्यंत्र के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। सत्ता के पक्ष में एकमात्र आधिकारिक सत्य निर्मित किया जाता है। यही कारण है कि इतिहासकार फासीवाद की पहचान केवल चुनावी राजनीति से नहीं, बल्कि उसके सांस्कृतिक और वैचारिक व्यवहार से भी करते हैं। भारतीय समाज की ऐतिहासिक शक्ति इसके विपरीत रही है। यहाँ चार्वाक से लेकर बुद्ध, कबीर, नानक, फुले, पेरियार, गांधी, आंबेडकर, भगत सिंह और राहुल सांकृत्यायन तक अनेक विचारधाराएँ समानांतर रूप से विकसित हुईं। किसी एक विचारधारा ने भारतीय समाज की संपूर्ण बौद्धिक परंपरा का प्रतिनिधित्व कभी नहीं किया। भारत की सभ्यता का मूल तत्व संवाद रहा है, एकरूपता नहीं। इसी कारण भारतीय संविधान ने भी विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास और आस्था की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया। राहुल सांकृत्यायन इस बहुलतावादी परंपरा के महत्वपूर्ण प्रतिनिधि थे। वे बौद्ध दर्शन के अध्येता थे, लेकिन अंधविश्वास के विरोधी थे। वे समाजवादी थे, लेकिन ज्ञान की स्वतंत्रता के समर्थक थे। उन्होंने धर्म, इतिहास, भाषा और संस्कृति का अध्ययन पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर किया। वे मानते थे कि समाज को आगे बढ़ाने के लिए मानसिक क्रांति सबसे आवश्यक है। उन्होंने लिखा था कि हमें मानसिक दासता की बेड़ियों को निर्ममता से तोड़ना होगा और रूढ़ियों से मुक्त होकर आगे बढ़ना होगा। यही विचार उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाते हैं। राहुल की प्रतिमा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह केवल एक व्यक्ति का स्मारक नहीं, बल्कि भारतीय बौद्धिक परंपरा का प्रतीक है। 1994 में उनकी जन्मशती के अवसर पर स्थापित यह प्रतिमा उस सामाजिक सम्मान की अभिव्यक्ति थी जो ज्ञान, विवेक और प्रगतिशील चिंतन के प्रति समाज व्यक्त करता है। ऐसे स्मारकों की रक्षा केवल सरकार का दायित्व नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। जिस समाज में अपने विचारकों की स्मृतियाँ असुरक्षित हो जाएँ, वहाँ लोकतांत्रिक संस्कृति भी धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि किसी विचारधारा से असहमति लोकतांत्रिक अधिकार है। राहुल सांकृत्यायन, लेनिन या किसी अन्य ऐतिहासिक व्यक्तित्व के विचारों की आलोचना की जा सकती है। उन पर बहस हो सकती है। उनके निष्कर्षों से असहमति व्यक्त की जा सकती है। किंतु लोकतांत्रिक समाज में विचारों का उत्तर विचारों से दिया जाता है, प्रतिमाएँ गिराकर नहीं। स्मारकों का ध्वंस वैचारिक विजय का प्रमाण नहीं होता; वह संवाद की पराजय का संकेत होता है। आज विश्व के अनेक देशों में लोकतांत्रिक संस्थाओं के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी हो रही हैं। सांस्कृतिक ध्रुवीकरण, राजनीतिक उग्रता और सोशल मीडिया के माध्यम से फैलती वैचारिक कट्टरता ने सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित किया है। ऐसे समय में लोकतांत्रिक समाजों के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है कि वे असहमति को लोकतंत्र का स्वाभाविक तत्व मानें, न कि शत्रुता का आधार। यदि हर विरोधी विचार को मिटाने का प्रयास होगा, तो अंततः लोकतंत्र का ही क्षरण होगा। रानीगंज की घटना की निष्पक्ष जाँच इसलिए भी आवश्यक है कि सत्य सामने आए। यदि यह केवल असामाजिक तत्वों की हरकत थी, तो उन्हें कानून के अनुसार दंड मिलना चाहिए। यदि इसके पीछे कोई संगठित षड्यंत्र था, तो उसकी भी पूरी पड़ताल होनी चाहिए। लोकतांत्रिक राज्य की विश्वसनीयता इसी में है कि वह निष्पक्षता से कार्य करे और किसी भी वैचारिक आग्रह से ऊपर उठकर न्याय सुनिश्चित करे। आज आवश्यकता केवल एक प्रतिमा पुनः स्थापित करने की नहीं है। आवश्यकता उस वैचारिक वातावरण को बचाने की है जिसमें राहुल सांकृत्यायन जैसे चिंतक पैदा होते हैं, लिखते हैं और समाज को नई दिशा देते हैं। विचारों को मिटाया नहीं जा सकता। इतिहास साक्षी है कि पुस्तकों को जलाने, प्रतिमाएँ गिराने और स्मृतियों को नष्ट करने के असंख्य प्रयास हुए, लेकिन विचार अंततः अधिक व्यापक रूप में लौटे। स्मारक ध्वस्त किए जा सकते हैं, किंतु विचार नहीं। राहुल सांकृत्यायन का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके जीवनकाल में था। उन्होंने समाज को भागने नहीं, बदलने का आह्वान किया। उन्होंने विवेक, वैज्ञानिक चेतना और सामाजिक न्याय को मानव मुक्ति का आधार माना। यदि हम वास्तव में उनकी स्मृति का सम्मान करना चाहते हैं, तो हमें लोकतांत्रिक मूल्यों, वैचारिक सहिष्णुता और बहुलतावादी संस्कृति की रक्षा करनी होगी। किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति उसके नागरिकों की सजगता में निहित होती है। जब नागरिक सार्वजनिक स्मृतियों, विचारों की स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए खड़े होते हैं, तभी लोकतंत्र मजबूत होता है। इसलिए रानीगंज की घटना को केवल एक स्थानीय विवाद मानकर भुला देना उचित नहीं होगा। यह हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र की रक्षा केवल चुनावों से नहीं होती; उसकी रक्षा विचारों के सम्मान, असहमति की स्वीकृति और सार्वजनिक स्मृतियों की सुरक्षा से भी होती है। यदि इन मूल्यों की उपेक्षा की गई, तो लोकतंत्र का बाहरी ढाँचा भले बचा रहे, उसकी आत्मा धीरे-धीरे क्षीण होती जाएगी। 15/07/2026
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