पूरी दुनिया में ऊर्ज़ा संकट का दौर

विदेश : वर्तमान समय को आनेवाले वर्षों में शायद उस दिन के रूपमें याद की जाएगी, जब दुनिया ने एकबार फिर महसूस किया कि कुछ शक्तिशाली देशों के राजनीतिक अहंकार और युद्ध प्रिय नीतियाँ पूरी मानवता को संकट में धकेल सकती हैं। पश्चिम एशिया की धरती पर भड़कती आग अब केवल मिसाइलों, बमों और सैनिकों तक सीमित नहीं रही है, बल्कि उसने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्ज़ा व्यवस्था और आम आदमी की रसोई तक को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्ज़ा बाजार को हिला दिया है। तेल और गैस की कीमतों में भारी उछाल ने पूरी दुनिया में भय, अस्थिरता और आर्थिक संकट का वातावरण बना दिया है। इस पूरे संकट के केंद्र में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंपका अड़ियल और टकराव पूर्ण रवैया सबसे अधिक चर्चा का विषय बना हुआ है। पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में लगातार सैन्य गतिविधियाँ बढ़ती जा रही थीं। ईरान और इज़राइल के बीच छद्म युद्ध पहले से ही जारी था, लेकिन जब अमेरिका खुलकर इस संघर्ष में उतर आया, तब हालात बेहद गंभीर हो गए। अमेरिका द्बारा ईरान पर लगाए गए नए आर्थिक प्रतिबंधों, समुद्री निगरानी और सैन्य दबाव ने पूरे क्षेत्र को युद्ध की दहलीज पर ला खड़ा किया। डोनाल्ड ट्रंप लगातार कठोर बयान देते रहे। उन्होंने कईबार सावजनिक मंचों से ईरानको “पूण समपण” करने की चेतावनी दी। उनका यह रवैया केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने वैश्विक बाजारों में घबराहट पैदा कर दी। ऊर्ज़ा विशेषज्ञों का मानना है कि आज दुनिया जिस ऊर्ज़ा संकट की ओर बढ़ रही है, उसके पीछे सबसे बड़ा कारण तेल आपूर्ति मार्गों पर मंडराता युद्ध का खतरा है। फारस की खाड़ी और होरमुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में गिने जाते हैं। दुनिया के कुल तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। यदि यह मार्ग बाधित होता है, तो पूरी दुनिया में तेल की आपूर्ति प्रभावित होना तय है। यही कारण है कि जैसे-जैसे युद्ध की आशंका बढ़ी, वैसे-वैसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें भी तेजी से बढ़ने लगीं। आज स्थिति यह है कि दुनिया के कई देशों में पेट्रोल और डीजल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। परिवहन महंगा हो रहा है। विमान सेवाओं की लागत बढ़ रही है। बिजली उत्पादन पर दबाव बढ़ रहा है। उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ने लगी है। इसका सीधा असर आम नागरिकों की जेब पर पड़ रहा है। जो संकट अभीऊज़ा क्षेत्र तक सीमित दिखाई दे रहा है, वह आने वाले समय में खाद्य संकट और महंगाई की सुनामी का रूप ले सकता है। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह संकट विशेष रूपसे चता जनक है। भारत अपनी ऊज़ा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। यदि तेल की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं, तो देश में पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और दैनिक उपयोग की वस्तुएँ महंगी हो जाएँगी। परिवहन खच बढ़ने से फल, सब्जियाँ, अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुओं के दाम भी बढ़ सकते हैं। इससे आम मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति पर भारी असर पड़ेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया एकबार फिर उन्नीस सौ तिहत्तर जैसे वैश्विक तेल संकट की ओर बढ़ सकती है। उस समय भी पश्चिम एशिया में तनाव के कारण तेल की कीमतों में भारी उछाल आया था और पूरी दुनिया आर्थिक मंदी की चपेट में आ गई थी। आज हालात उससे भी अधिक खतरनाक दिखाई दे रहे हैं, क्योंकि अब दुनिया की अर्थव्यवस्था पहले से कहीं अधिक ऊर्ज़ा पर निर्भर हो चुकी है। युद्ध के कारण समुद्री व्यापार पर भी गंभीर असर पड़ रहा है। तेल लेजाने वाले जहाजों की सुरक्षा लागत बढ़ गई है। बीमा कंपनियाँ भारी प्रीमियम वसूल रही हैं। कई जहाज कंपनियाँ युद्ध क्षेत्र से गुजरने में डर महसूस कर रही हैं। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। इसका असर केवल तेल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक सामान, खाद्यान्न, दवाइयों और रोजमर्रा की वस्तुओं की आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है। ट्रंप प्रशासन की सबसे अधिक आलोचना इस बात को लेकर हो रही है कि उसने कूटनीतिक समाधान की बजाय सैन्य दबाव की नीति अपनाई। कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका ने शुरुआत से ही बातचीत और मध्यस्थता का रास्ता अपनाया होता, तो हालात इतने खराब नहीं होते। लेकिन ट्रंप का राजनीतिक स्वभाव हमेशा से आक्रामक रहा है। वे स्वयं को एक कठोर और निर्णायक नेता के रूपमें प्रस्तुत करना चाहते हैं। यही कारण है कि उन्होंने लगातार ऐसे बयान दिए, जिनसे तनाव कम होने की बजाय और अधिक बढ़ता गया। विश्व राजनीति के जानकारों का कहना है कि ट्रंप की नीतियाँ केवल ईरान तक सीमित नहीं हैं। वे वैश्विक राजनीति में अमेरिकी प्रभुत्व को किसी भी कीमत पर बनाए रखना चाहते हैं। यही कारण है कि वे आर्थिक प्रतिबंधों, सैन्य दबाव और कठोर विदेश नीति को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानते हैं। लेकिन समस्या यह है कि इस रणनीति का सबसे बड़ा नुकसान आम जनताको उठाना पड़ता है। यूरोप इस संकट से बेहद परेशान दिखाई दे रहा है। रूस और यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप पहले ही ऊज़ाÃ संकट से जूझ रहा था। अब पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने उसकी चताएँ और बढ़ा दी हैं। कई यूरोपीय देशों में गैस और बिजली की कीमतें पहले से ही ऊँचे स्तर पर हैं। उद्योगों की लागत बढ़ रही है। कई कारखाने उत्पादन घटाने पर मजबूर हो रहे हैं। यदि यह संकट लंबा खचता है, तो यूरोप में बेरोजगारी और आर्थिक मंदी का खतरा और बढ़ सकता है। चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई देशों की स्थिति भी आसान नहीं है। ये देश ऊज़ा आयात पर अत्यधिक निभर हैं। यदि पश्चिम एशिया में युद्ध और बढ़ता है, तो एशिया की आर्थिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है। दुनिया की बड़ी अर्थ व्यवस्थाओं में अस्थिरता बढ़ सकती है। शेयर बाजारों में गिरावट आ सकती है। निवेशकों का विश्वास कमजोर पड़ सकता है। इस पूरे संकट का एक और बड़ा पहलू यह है कि अब युद्ध केवल बंदूकों और मिसाइलों से नहीं लड़े जाते। आज ऊर्ज़ा स्वयं एक हथियार बनचुकी है। तेल और गैस की आपूर्ति रोक कर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झकझोरा जा सकता है। यही कारण है कि ऊर्ज़ा मार्गों पर नियंत्रण को लेकर इतनी तीखी प्रतिस्पर्धा दिखाई दे रही है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि होरमुज़ जलडमरूमध्य पूरी तरह बंद हो गया, तो दुनिया में तेल की कीमतें ऐतिहासिक स्तर पर पहुँच सकती हैं। इससे वैश्विक महंगाई बेकाबू हो सकती है। गरीब और विकासशील देशों की अथव्यवस्था चरमरा सकती है। कई देशों में राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक अशांति बढ़ सकती है। दुनिया के कई बुद्धिजीवी और शांति समथक संगठन लगातार यह कह रहे हैं कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है। यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम नहीं हुआ, तो इस का नुकसान केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा। पूरी दुनिया इसकी कीमत चुकाएगी। आज भी दुनिया को रोना महामारी और विभिन्न युद्धों के आर्थिक प्रभावों से पूरी तरह उबर नहीं पाई है। ऐसे समय में नया ऊज़ा संकट वैश्विक अथ व्यवस्था को गहरे अंधकार में धकेल सकता है। इस संकट का सबसे दुखद पहलू यह है कि दुनिया की राजनीति में मानवीय संवेदनाएँ लगातार कमजोर होती दिखाई दे रही हैं। आम नागरिक महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक संकट से जूझ रहा है, लेकिन शक्तिशाली देशों के नेता शक्ति प्रदर्शन और राजनीतिक प्रभुत्व की लड़ाई में व्यस्त हैं। युद्ध से सबसे अधिक लाभ हथियार उद्योगों और बड़ी ऊज़ा कंपनियों को होता है, जबकि आम जनता केवल पीड़ा, महंगाई और असुरक्षा झेलती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि संयुक्त राष्ट्र और विश्व समुदाय सक्रिय भूमिका निभाएँ। भारत, चीन, यूरोपीय संघ और अन्य प्रमुख देशों को मिलकर मध्यस्थता करनी चाहिए। यदि समय रहते शांति स्थापित नहीं हुई, तो आनेवाले महीनों में दुनिया एक ऐसे आर्थिक तूफान का सामना कर सकती है, जिस की मार दशकों तक महसूस की जाएगी। डोनाल्ड ट्रंप का अड़ियल रवैया आज पूरी दुनिया के लिए चिता का विषय बन चुका है। उनकी आक्रामक विदेश नीति ने पश्चिम एशिया को बारूद के ढेर पर ला खड़ा किया है। यदि यह आग और भड़की, तो केवल एक क्षेत्र नहीं, बल्कि पूरी मानवता इसकी चपेट में आ जाएगी। आज दुनिया को युद्ध नहीं, बल्कि समझदारी, संवाद और शांति की आवश्यकता है। क्योंकि जब ऊर्ज़ा संकट पैदा होता है, तब उसका असर केवल तेल के दामों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह हर घर की रसोई, हर परिवार की आर्थिक स्थिति और हर देश की स्थिरता को प्रभावित करता है। इतिहास गवाह है कि युद्ध कभी स्थायी समाधान नहीं देते। वे केवल विनाश, महंगाई और अस्थिरता छोड़ जाते हैं। आज पूरी दुनिया उसी मोड़ पर खड़ी है, जहाँ एक गलत निर्णय मानवता को भारी संकट में धकेल सकता है। अब यह विश्व नेतृत्व पर निर्भर करता है कि वह अहंकार और शक्ति प्रदर्शन का रास्ता चुनता है या फिर शांति और सहयोग का।


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