चाय बागानों की बुनियादी समस्या
उत्तर बंगाल के दार्जिलिंग और डुवार्स में चाय की खेती का एक अत्यंत रोचक इतिहास है। ज्ञातव्य है कि ब्रिटिश भारत में सबसे पहले चाय की खेती सन् 1841 में शुरू हुई। इस्ट इण्डिया कम्पनी के एक वरिष्ठ अधिकारी डा. आर्ची बाल्ड कैंपबेल ने दार्जिलिंग के बीचबूड (Beechwood) में चीन से चुराकर लाये गये चाय के बीज बोये और वे अपने उद्देश्य में कुछ हद तक सफल रहे। अपनी आंशिक सफलता से उत्साहित होकर डा. कैंपबेल ने अपने पिछले अनुभवों को अपडेट करते हुए 1850 के दशक में व्यवसायिक स्तर पर विधिवत चाय-बागानों की शुरुआत की। चूंकि परिणाम सकारात्मक रहा, इससे अति उत्साहित होकर उन्होंने उप-हिमालयी क्षेत्रों, मैदानी इलाकों तराई और डुवार्स की भूमि को चाय की खेती के लिए चिह्नत कर कई बागान स्थापित किए। डुवार्स में पहला चाय-बागान सन् 1874 से 76 के दौरान स्थापित किया गया। बहरहाल परवर्ती समय में दार्जिलिंग और डुवार्स के जिन विस्तृत भू-भागों में फ़िरंगी हुक्मरानों द्वारा चाय-बागानों की स्थापना की गयी, उसका एक बेहद रोमांचक किस्सा है, अविस्मरणीय इतिहास है। उन दिनों यह पूरा क्षेत्र पहाड़ों, घने जंगलों और हिंस्र वन्य-जीवों से भरा हुआ था। और आज की तरह सड़कें नहीं थीं। यातायात के साधन भी नहीं थे। दुर्गम मार्ग की अत्यंत कष्टकर पैदल यात्रा, घोड़े और हाथियों की सवारी ही एकमात्र साधन थे। सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इन क्षेत्रों में चाय-बागानों की स्थापना का संघर्ष कितना कितना कठिन और जोखिम भरा रहा होगा! आज़ दार्जिलिंग व डुवार्स में जो थोड़े-बहुत प्राकृतिक सौंदर्य और हरियाली बचे हुए हैं, निस्संदेह इसमें ब्रिटिश भारत के हुक्मरानों का ऐतिहासिक योगदान है। मैंने अपने पिछले एपिसोड में इस बात की चर्चा की थी कि Tea, Timber और Tourism इस क्षेत्र विशेष की अर्थनीति का एक मजबूत आधार रहे हैं लेकिन दुर्भाग्यवश पिछले कई दशकों से ये आधार लगातार कमजोर होते चले आ रहे हैं। और यही वह ख़ास वजह है जिससे ख़ासकर इस क्षेत्र के श्रमिकों तथा मेहनतकश अवाम के समक्ष जीविकोपार्जन का एक विकट प्रश्न उठ खड़ा हो गया है। चाय-बागानों की बुनियादी समस्याओं को समग्रता में समझकर ही हमें एक स्थाई समाधान की दिशा में साकारात्मक प्रयास करते रहने होगे। और हमारे संपादकीय का मुख्य उद्देश्य भी यही है। यह तय है कि इस क्षेत्र विशेष की आर्थिक खुशहाली के लिए जहां चाय-बागानों को बचाया जाना ज़रूरी है। वहीं जंगलों के ध्वंस को दृढ़तापूर्वक रोकना होगा। पर्यटन का संभावित विकास व निश्चित तौर से रोजगार का सृजन-विस्तार कर कुछ हद तक दार्जिलिंग, उप-हिमालयी क्षेत्रों, मैदानी इलाकों, तराई एवं डुवार्स को गंभीर होते आर्थिक संकट से उबारा जा सकता है। दार्जिलिंग व डुवार्स के अधिकांश चाय-बागान अव्यवस्था के शिकार हैं। यहां तक कि आर्थिक, पर्यावरणीय और प्रशासनिक संकटों से जूझ रहे हैं। बेशक चाय-बागान श्रमिकों की कम मजदूरी, मानवाधिकारों का हनन, मजदूरों का पालायन,अक्सर होने वाले लाक आउट व हड़ताल, चाय-पौधों का पुराना होना, जलवायु परिवर्तन आदि कारणों से उत्पादन में गिरावट, नेपाल और श्रीलंका से सस्ते दर पर चाय का अवैध आयात आदि ऐसे कई कारण हैं जिनसे भारतीय चाय-उद्योग जूझ रहा है। और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि सरकार की गलत नीतियों के कारण अब बैंकों ने भी अपने हाथ खींच लिए हैं। उत्तर बंगाल के चाय-बागानों में लगभग 3 लाख मजदूर काम करते हैं। अगर एक परिवार में दो बच्चे भी हों तो यहां सवाल 6 लाख बच्चों के भविष्य का है। उनके शिक्षा और स्वास्थ्य का सवाल है। सरकारी स्कूलों की हालत सर्वविदित है। प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा महंगी है, वहां वे अपने बच्चों को पढ़ा नहीं सकते। अपनी शिक्षा पूरी किए बगैर ही अधिकांश बच्चे जीविकोपार्जन की तलाश में राज्य से बाहर चले जाते हैं। इन क्षेत्रों की एक दूसरी बड़ी समस्या मानव तस्करी की है। ख़ासकर बालक-बालिकाओं की तस्करी child Trafficking जो एक गंभीर अपराध है, अवाध गति से जारी है। श्रम कानूनों का उल्लंघन, टी बोर्ड की उदासीनता, न्यूनतम मजदूरी, ऐसे तमाम सवाल हैं, जिन्हें सरकार, प्रबंधन और श्रमिक यूनियन अगर चाहें तो आपस में मिल बैठकर काफी हद तक समाधान कर सकते हैं। लेकिन इस दिशा में किसी भी पक्ष से सकारत्मक प्रयास नहीं किये जा रहे हैं। अर्से से उत्तर बंगाल के लगभग 32 चाय बागान बंद पड़े हैं और इसे लेकर राज्य या केंद्र सरकार की कोई खास पहल नहीं दिखाई पड़ रही।
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